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Wednesday, May 1, 2013

ग़ज़ल : आसमां की सैर करने चाँद चलकर आ गया

बह्र : रमल मुसम्मन सालिम

वक्त ने करवट बदल ली जो अँधेरा छा गया,
आसमां की सैर करने चाँद चलकर आ गया,

प्यार के इस खेल में मकसद छुपा कुछ और था,
बोल कर दो बोल मीठे जुल्म दिल पे ढा गया,

बाढ़ यूँ ख्वाबों की आई है जमीं पर नींद की,
चैन तक अपनी निगाहों का जमाना खा गया,

झूठ का बाज़ार है सच बोलना बेकार है,
झूठ की आदत पड़ी है झूठ मन को भा गया,

तालियों की गडगडाहट संग बाजी सीटियाँ,
देश का नेता हमारा यूँ शहद बरसा गया.....

15 comments:

  1. सदाMay 1, 2013 at 11:48 AM

    वाह ... हमेशा की तरह बेहतरीन प्रस्‍तुति

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  2. धीरेन्द्र सिंह भदौरियाMay 1, 2013 at 1:18 PM

    बहुत बेहतरीन सुंदर गजल ,,,अरुन जी

    RECENT POST: मधुशाला,

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  3. Rajendra KumarMay 1, 2013 at 3:50 PM

    बहुत ही बेहतरीन और लाजबाब ग़ज़ल की प्रस्तुति,आभार.

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  4. Shalini RastogiMay 1, 2013 at 4:19 PM

    प्यार के इस खेल में मकसद छुपा कुछ और था,
    बोल कर दो बोल मीठे जुल्म दिल पे ढा गया,
    .. वाह अरुण जी ..क्या बात कही है...बेहतरीन गज़ल!

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  5. हरकीरत ' हीर'May 1, 2013 at 4:39 PM

    मत्ला लाजवाब लगा ....

    आसमां की सैर करने चाँद चलकर आ गया ....

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  6. ranjana bhatiaMay 1, 2013 at 5:35 PM

    bahut sundar gajal likhi hai aapne badhaai arun ji

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  7. jyoti khareMay 1, 2013 at 7:26 PM

    सुंदर रचना मन को छूती हुई
    बधाई


    jyoti-khare.blogspot.in
    कहाँ खड़ा है आज का मजदूर------?

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  8. Vandana TiwariMay 1, 2013 at 8:40 PM

    झूठ का बाज़ार है,सच बोलना बेकार है
    झूठ की आदत पड़ी है झूठ मन को भा गया...
    सुन्दर कथ्य!
    मनमोहक गज़ल के लिए सादर बधाई स्वीकारें।
    सादर

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  9. Sunita AgarwalMay 1, 2013 at 9:08 PM

    bahut hi sundar gajal :) mujhe apke blog ka desing bhi bahut sundar laga

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  10. अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com)May 1, 2013 at 10:25 PM

    बोल कर दो बोल मीठे,जुल्म दिल पे ढा गया

    इस एक लाइन ने पूरी गज़ल का सार कह दिया............

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  11. Ranjana VermaMay 2, 2013 at 7:25 AM

    बहुत सुंदर ग़ज़ल..... प्रस्तुति!!

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  12. सरिता भाटियाMay 2, 2013 at 9:57 AM

    लाजवाब अरुण की लाजवाब गजल ,बधाई अरुण

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  13. Kailash SharmaMay 2, 2013 at 1:59 PM

    झूठ का बाज़ार है सच बोलना बेकार है,
    झूठ की आदत पड़ी है झूठ मन को भा गया,

    ...वाह! बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल...

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  14. Abhijit ShuklaMay 2, 2013 at 3:26 PM

    acchi prastuti! badhaiyan!

    -Abhijit (Reflections)

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  15. कालीपद प्रसादMay 2, 2013 at 9:49 PM

    बहुत सुंदर गजल अरुन जी !
    डैश बोर्ड पर पाता हूँ आपकी रचना, अनुशरण कर ब्लॉग को
    अनुशरण कर मेरे ब्लॉग को अनुभव करे मेरी अनुभूति को
    lateast post मैं कौन हूँ ?
    latest post परम्परा

    ReplyDelete
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